ज्ञानकर्मी कुलपति : डा जनार्दन वाघमारे
केवल ज्ञान के बल पर सभी उच्च पदों पर पहुँचने वाले, अखंड रूप से ज्ञानयज्ञ चलाने वाले ज्ञानर्षि डॉ. जनार्दन वाघमारे सर थे। वे केवल पदों से बड़े नहीं थे, बल्कि उनकी वैचारिक ऊंचाई भी थी। उन्होंने आयुष्यभर ज्ञान, प्रामाणिकता और समाजप्रेम का ध्यास लिया। शिक्षा क्षेत्र में उन्होंने जो कार्य किया है, वह अमूल्य है। नवनिर्मित स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के वे संस्थापक कुलपति थे। वे कुलपति थे, उस समय मैं इस विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। इस विश्वविद्यालय ने हमें बनाया। सर ने इस विश्वविद्यालय को भारतभर में नाम दिलाया। उन्होंने अपने पद का उपयोग दलित, वंचित, दुर्बल, दुर्लक्षित घटकों के लिए किया। कई नए प्रयोग किए। वे लातूर के नगराध्यक्ष बने। बाद में वे राज्यसभा में भी गए। वहाँ भी अपनी अध्ययनपूर्ण मांडणी से उन्होंने राज्यसभा को गाजाया। मराठी, हिंदी और अंग्रेजी इन तीनों भाषाओं पर उनका प्रभुत्व था। वे राज्यपाल बनने की भी संभावना थी। उनकी अत्यंत ओघवती, शांत अध्ययनपूर्ण व्याख्यान सुनने का एक भी अवसर मैंने और मेरे सहपाठियों ने नहीं छोड़ा। वह समय इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राध्यापकों को कुलपति नियुक्त करने का नहीं था। कुलपति क्या होता है, इस पद का आब कैसे रखना है, इसकी जाणीव रखने वाला वह समय था। विश्वविद्यालय अपने जाति के या संगठन के लोगों के लिए कुरण समझने के समय में उनका निधन होना बड़ी हानि है। विश्वविद्यालय के पहले कुलपति के रूप में उन्होंने केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं निभाई, बल्कि विश्वविद्यालय को मूल्याधिष्ठित शिक्षा की दिशा दी। शिक्षा केवल पदवी प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि जीवन घड़ने की प्रक्रिया है, इस पर उनका ठाम विश्वास था। लातूर के नगराध्यक्ष के रूप में कार्य करते समय उन्होंने शहर विकास के साथ ही संस्कार और सामाजिक बांधिलकी पर जोर दिया। प्रशासन में पारदर्शिता, निर्णय में धैर्य और लोगों के प्रति आत्मीयता उनकी कार्यशैली की विशेषताएँ थीं। उनके जीवन का एक प्रेरणादायक प्रसंग है जीवन कैसे जीना है, इसकी खोज। वडवळ नामक इस बेट पर पुस्तकें और दशम्या लेकर छह मित्रों ने तीन दिन चिंतन-चर्चा की। सुखी जीवन का मूलमंत्र खोजने का यह प्रयास उनके विचारशील वृत्ति का प्रतीक है। केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए आदर्श जीवन कैसे घड़ाना है, इसके लिए उन्होंने आयुष्य व्यतीत किया। आज उन छह मित्रों में से 'शेवटचे पान गळून पडले', यह जाणीव मन हेलावून टाकने वाली है। वे बताते हैं, 'उन तीन दिनों में सभी ने अपने को क्या बनाना है, किसका आदर्श सामने रखना है, यह लिखकर चिट्ठियाँ टाकीं। दिगंबरराव होळीकर ने एक एक चिट्ठी उठाकर उसे पढ़कर सुनाया। दिगंबरराव होळीकर ने योगीराज श्रीकृष्ण का आदर्श रखा था। उनके ऊपर गीता का प्रभाव था। वे कर्मयोगी बनना चाहते थे। निवृत्तीराव होळीकर ने स्वामी श्रद्धानंद का आदर्श रखा था। वे आर्यसमाज और देश की निरंतर सेवा करना चाहते थे। रामप्रसाद बाहेती ज्ञानेश्वरी के भक्त थे। उन्हें भक्तियोग पसंद था। ज्ञानेश्वर का आदर्श उन्होंने रखा था। नागनाथराव सूर्यवंशी ने न्याय महादेव गोविंद रानडे का आदर्श रखा था। न्याय रानडे के विचार उन्हें आत्मसात करने थे। गणपतराव बाजूळगे प्रसिद्ध चित्रकार बनना चाहते थे। चित्रकला का उन्हें बचपन से ही छंद था। जनार्दन वाघमारे ने मर्यादापुरुषोत्तम राम का आदर्श रखा था। वे सत्यवचनी और न्यायी बनना चाहते थे। हम सभी अपने समाज और देश की निःस्वार्थ सेवा करना चाहते थे। जातिव्यवस्था के कारण इस देश की प्रचंड हानि हुई है, इसलिए हम अंतरजातीय विवाह के माध्यम से जातिव्यवस्था को छेद देना चाहते थे। सभी ने व्यसनाधीनता से दूर रहने का निश्चय किया था। तीन दिनों की चर्चा में हमने अपने को क्या करना है, इसका गहराई से विचार किया। दिगंबरराव होळीकर ने इन चिट्ठियों को पढ़कर सुनाने के बाद सभी ने अपना मनोगत व्यक्त किया और प्रतिज्ञा ली।' यह डॉ. वाघमारे सर ने 'देवमाणूस' पुस्तक प्रकाशन समारोह में बताया था। यह दशकपूर्ति अंक में भी लिखा गया है। तुकाराम बिरादार लिखित 'देव तेथेचि जाणावा' नामक होळकर सर के चरित्र को लिखी गई प्रस्तावना में भी इसका उल्लेख है। होळकर सर के कहने पर गाववालों ने अपने परंपरागत आख्यान का त्याग करके केवल होळकर यह आख्यान धारण किया था। इस कारण डॉ. वाघमारे सर पर होळकर सर का प्रचंड प्रभाव था। 'एक नगराध्यक्ष का चिंतन' इस ग्रंथ में उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में जैसे लातूर पैटर्न निर्माण हुआ, वैसे ही राजनीति में गुणवत्ता कैसे लाई जाए, इस दृष्टि से चिंतन मांडा। वे नगराध्यक्ष बनना प्लेटो के आदर्श राज्य संकल्पना के प्रत्यक्ष तत्त्वज्ञ राजा का अनुभव करना था। अन्यथा आज के समय में तत्त्वज्ञ व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया से चुने जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन लातूर का मतदाता तसा मतभान रखने वाला है, इसलिए वे सीधे जनता से चुनकर आए और नगराध्यक्ष बने। मराठवाड़ा में विचारक साहित्यकार प्राचार्य डॉ. नरहर कुरुंदकर, प्राचार्य डॉ. सुरेंद्र बारलिंगे, प्राचार्य डॉ. हेमचंद्र धर्माधिकारी, प्राचार्य गोविंद गोपछडे और उदगीर के प्राचार्य डॉ. ना. य. डोळे भी प्रचंड विद्वान विचारक लेखक तत्त्वज्ञ साहित्यकार लोकशिक्षक थे, लेकिन उन्हें डॉ. जनार्दन वाघमारे सर जैसा शिक्षा और राजनीति का संतुलन साधना नहीं आया। नामांतर आंदोलन के बाद वे स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय नांदेड़ के संस्थापक कुलपति बने। 'मूठभर माती' उनका आत्मचरित्र उनके जीवनप्रवास का प्रामाणिक चित्रण है। उसमें कई पृष्ठों पर होळकर सर का उल्लेख आता है। इस पुस्तक से उनके संघर्ष की, मूल्यनिष्ठता की और आत्मपरीक्षण की झलक मिलती है। उन्होंने अपने यशापयश को प्रांजलता से देखा और समाज के सामने आदर्श रखा। डॉ. जनार्दन वाघमारे का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे अध्ययनशील थे, लेखक थे, संघटक थे और सबसे महत्वपूर्ण यह कि संवेदनशील मानव थे। उन्होंने आयुष्यभर विचारों की मशाल जलाए रखी। समाज में विषमता, अज्ञान और अन्याय के खिलाफ उन्होंने लेखनी और कृती का उपयोग किया। उनके जाने से आज एक विचारधारा रुक गई, ऐसा लगता है, लेकिन उन्होंने दिए विचार, उन्होंने घड़े विद्यार्थी और उन्होंने लिखी पुस्तकें ही उनकी असली स्मृति है। 'माणूस जाता है, लेकिन विचार अमर रहते हैं', यह उनके जीवन ने सिद्ध किया। होळकर सर के अंतिम संस्कार के समय वे बोले थे, 'जीवन का आखिरी टप्पा खत्म होने पर मृत्यु का क्षण आता है। हमें जीवन भी समझना चाहिए और मृत्यु भी समझना चाहिए। जीवन समझना आसान है, लेकिन मृत्यु समझने में देर लगती है। आखिर जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो कर्मयोग का जीवन जीता है, उसके लिए जीवन और मृत्यु दोनों ही वरदान हैं।' हमारा यह आधारवड हमें छोड़कर चला गया, इसका मनस्वी दुःख है।
मूल लेखक - प्रा.डा. दत्ताहरी होनराव
अनुवाद - डी. बी. देवकत्ते
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें